नॉन-रेजिडेंट से प्रॉपर्टी खरीदना हो सकता है घाटे का सौदा, टैक्स देनदारी पर पड़ता है असर

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     नॉन-रेजिडेंट से प्रॉपर्टी खरीदने वाले लोग अक्सर अपने आपको टैक्स संबंधी मुश्किलों में फंसा पाते हैं। फंसने की सबसे बड़ी वजह यह होती है कि उन्हें पता ही नहीं होता कि जिससे वह प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं वह भारत का नागरिक है या नहीं। नॉन-रेजिडेंट और रेजिडेंट से प्रॉपर्टी खरीदने में बड़ा अंतर होता है। दरअसल, नॉन-रेजिडेंट के प्रॉपर्टी खरीदने पर 20 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा टैक्स देनदारी हो सकती है। जबकि भारतीय नागरिक से जमीन लेने पर देनदारी सिर्फ 1 प्रतिशत रहती है।

     अगर आप देश के नागरिक से ही प्रॉपर्टी खरीदते हैं तो सेक्शन 195-IA के तहत आपको टीडीएस तब ही देना होगा जब सौदा 50 लाख से ऊपर का हो। लेकिन अगर नॉन-रेजिडेंट से प्रॉपर्टी खरीदी जाती है तो सौदा चाहे कितने का भी हो टीडीएस देना ही होता है।

कौन होता है नॉन-रेजिडेंट?

      नॉन-रेजिडेंट कौन होता है? यह सामान्य भाषा में सबको पता है, लेकिन टैक्स की बात करें को इसकी परिभाषा थोड़ी अलग होती है। यहां भारत में शख्स कितने दिन रहा उससे इनकम टैक्स के लिए उसका रेजिडेंट स्टेट्स तय होता है। जो शख्स वित्त वर्ष में 182 दिन भारत में रहा वह भारत का नागरिक माना जाता है।

कैसे करें पहचान?

     आम नागरिक इसे आसानी से नहीं पहचान पाता क्योंकि एनआरआई अपनी प्रॉपर्टी का सौदा किसी ब्रोकर से करवाता है। वह खुद आमने-सामने मिलने की जगह फोन या ईमेल के जरिए पूरी बातचीत करता है। मिलने के लिए कोई खास दिन तय करता है। ऐसे मामलों में सावधान रहने की जरूरत है।

क्या करें?

     सबसे सरल तरीका है कि आप रियल एस्टेट एजेंट से साफ-साफ पूछ लें कि प्रॉपर्टी बेच रहा शख्स रेजिडेंट है या नॉन रेजिडेंट। अगर तब भी शंका हो तो पासपोर्ट और आईटी रिटर्न की कॉपी मांगी जा सकती है। अगर बेचनेवाला यह दस्तावेज देने में हिचके तो सीए से मिला सर्टिफिकेट भी दिखाने को कह सकते हैं।

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source: नवभारत टाइम्स.

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