घर खरीदकर पछताना नहीं चाहते तो इन बातों का रखें खास ध्यान

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     home rera _2235945_835x547-m      मनपसंद घर के बारे में सबकी अपनी-अपनी राय हो सकती है, लेकिन चूंकि पैसा एक अहम पहलू है, लिहाजा चाहतों पर उसी के मुताबिक लगाम लगानी पड़ती है। फिर भी अधिकतर होम बायर्स जब अपने सपने को हकीकत की शक्ल देने चलते हैं तो उनके पांव चादर से बाहर निकल जाते हैं। हर होम बायर को यह सवाल खुद से पूछना चाहिए कि क्या उसे बहुत बड़े बेडरूम, अटैच्ड टेरेस और इटैलियन मार्बल फ्लोरिंग की जरूरत है? परफेक्ट घर खरीदने की कोशिश में लोग अपनी माली हालत को ऐसी चपत लगा बैठते हैं कि चोट का इलाज करना लगभग नामुमकिन हो जाता है। अपनी वित्तीय स्थिति का ठीक से अंदाजा लगाए बिना बड़ा मकान खरीदने वाले लोग कर्ज के जाल में फंस सकते हैं। संकेत धानोरकर के अनुसार, ऐसी सूरत से बचने के लिए नीचे दी हुई बातों पर गौर करें:

ड्रीम हाउस या पैसे का सोख्ता

     एक्सपर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में होम बायर्स की चाहतों का दायरा बहुत ज्यादा बदल चुका है। बैंकबाजारडॉटकॉम के सीईओ आदिल शेट्टी ने कहा, ‘बायर्स, खासतौर से युवाओं के लिए यह महज एक घर खरीदने या उनकी जेब के लिहाज से सबसे बड़ी प्रॉपर्टी खरीदने भर का मामला भर नहीं रह गया है। घर अब सेल्फ-एक्सप्रेशन का मामला भी है।’ नाइट फ्रैंक इंडिया, चेन्नै में डायरेक्टर कंचन कृष्णन ने कहा, ‘आज के होम बायर्स युवा हैं। वे नई चीजें चाहते हैं। उनकी पसंद का दायरा बड़ा है। इनकम लेवल बढ़ने के साथ बैंकों और हाउसिंग फाइनैंस कंपनियों की ओर से आसानी से कर्ज मिल जाने से कंज्यूमर्स की चाहतों को नया आसमान मिल गया है।’

      बैंक चूंकि प्रॉपर्टी की वैल्यू के 80-85 पर्सेंट से ज्यादा का लोन नहीं देते हैं, लिहाजा शुरुआत में बायर को डाउन पेमेंट के रूप में एकमुश्त रकम देनी होती है। अधिकतर लोग अपनी बचत के बड़े हिस्से का इस्तेमाल यह पेमेंट करने और होम लोन हासिल करने में कर देते हैं। ईटी वेल्थ के एक सर्वे में पाया गया कि हर तीन में से एक इंडियन होम बायर अपनी टोटल सेविंग्स का 50 पर्सेंट से ज्यादा हिस्सा डाउन पेमेंट में लगा देता है।

      अर्थ यंत्र की ओर से की गई एक अनैलेसिस में पाया गया कि प्रमुख शहरों में शुरुआती डाउन पेमेंट के लिए पैसा जुटाने में लगने वाला समय काफी ज्यादा है। 25 पर्सेंट की ऐनुअल सेविंग्स रेट मानने पर मुंबई में डाउन पेमेंट के लिए पर्याप्त रकम जुटाने में लगभग 12 साल लगेंगे। वहीं दिल्ली और चेन्नै में रहने वालों को लगभग सात साल लग जाएंगे।

      हालांकि शुरुआती पेमेंट और बाद में ईएमआई भुगतान के लिए सेविंग्स का इंतजाम रखने भर से बात नहीं बनती क्योंकि ज्यादा सुविधाओं वाले घरों की अतिरिक्त लागत भी होती है।

     वाइजइनवेस्ट अडवाइजर्स के सीईओ हेमंत रुस्तगी ने कहा, ‘अगर आप अपेक्षाकृत लकदक इलाके में रहने जाएं तो आपकी लाइफस्टाइल पर उसका असर भी पड़ेगा। हालांकि आपकी इनकम और सेविंग्स प्रोफाइल रातोंरात नहीं बदलने वाली।’ शानदार एक्सटीरियर अपने घर की आंतरिक साज-सज्जा मैच कराने के लिए आपको काफी रकम खर्च करनी पड़ सकती है। इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि मकान की कीमत और उसकी देखरेख की लागत में भी एक नाता होता है। कृष्णन ने कहा, ‘होम बायर्स प्राय: अपने सरप्लस का बढ़ा-चढ़ाकर अनुमान लगा बैठते हैं और फिर कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।’

वैल्यू फॉर मनी हासिल करना

      आपको इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि आप जरूरत पड़ने पर अपनी प्रॉपर्टी बेचकर उसकी पूरी वैल्यू हासिल कर सकेंगे। रियल एस्टेट लिक्विडिटी के लिहाज से बहुत अच्छा ऐसेट नहीं है और मौजूदा मार्केट यह साबित कर रहा है कि अपनी पसंद की कीमत पर खरीदार मिलना कितना मुश्किल है। रुस्तगी का कहना है, ‘प्रीमियम हाउसिंग सेगमेंट में विशेषतौर पर लिक्विडिटी काफी कम हो सकती है क्योंकि जो आपको अच्छा लगता है वह जरूरी नहीं है कि अन्यों को भी पसंद आए।’

       भविष्य में प्रॉपर्टी की वैल्यू बढ़ने पर निर्भर करने से भी आपको मुश्किल हो सकती है। इस उम्मीद के आधार पर एक बड़ा होम लोन लेना समझदारी नहीं होगी। 1997-2002 के दौरान मुंबई में घरों की कीमतें 40-50 पर्सेंट तक गिरी थी, जबकि कुछ अन्य स्थानों पर प्राइसेज में अधिक कमी नहीं आई थी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जो होमबायर्स अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉजेक्ट में घर खरीद रहे हैं उन्हें टैक्स बेनिफिट के लिए बड़ा होम लोन लेने से बचना चाहिए। ऐसे मामलों में हाउसिंग लोन के इंट्रेस्ट के भुगतान पर टैक्स डिडक्शन 30,000 रुपये प्रति वर्ष तक सीमित है। तैयार प्रॉपर्टीज के लिए 2 लाख रुपये तक के टैक्स डिडक्शन की अनुमति है।

क्या यह इतनी कीमत रखता है?

      बहुत से परिवार अपने बजट से बाहर जाकर ऐसी जगहों पर घर खरीद लेते हैं जो भले ही उनकी सामाजिक हैसियत को बढ़ाता है लेकिन वहां उन्हें बेहतर लाइफस्टाइल नहीं मिलता। एनारॉक प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्स के चेयरमैन, अनुज पुरी ने कहा, ‘एक शांत और बिना पॉल्यूशन वाले एरिया में घर खरीदने की इच्छा रखने वाले होमबायर्स कई बार ऐसी जगह पर फंस जाते हैं जहां पानी और बिजली की कमी होती है और जरूरी सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं। ऐसी जगहों पर घरों की वैल्यू बढ़ना बहुत मुश्किल होता है और इस वजह से उन्हें बेचकर कहीं और शिफ्ट होने की संभावना कम हो जाती है।’

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source: नवभारत टाइम्स.

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