रियल्टी के फेस्टिव ऑफर्स की रियलिटी

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      त्योहारी सीजन में रियल एस्टेट डिवेलपर्स बड़े डिस्काउंट्स और कई अन्य चीजें मुफ्त ऑफर कर रहे हैं, योगिता खत्री बता रही हैं कि मार्केटिंग की इस रणनीति में घर खरीदने वालों के लिए काम की कौन सी चीजें हैं

     इस बार फेस्टिव सीजन में रियल्टी सेक्टर में ऑफर्स की भरमार है। पजेशन तक ईएमआई चुकाने की जरूरत नहीं, लाखों के कैश डिस्काउंट्स, फ्री मॉड्यूलर किचेन, फ्री कार से लेकर जीएसटी से छूट तक इस लिस्ट में तमाम चीजें शामिल की गई हैं। हालांकि सवाल यह उठ रहा है कि ये ऑफर ठीक हैं या पिछले दो वर्षों से सुस्ती झेल रहे प्रॉपर्टी मार्केट से किसी तरह उबरने की रियल एस्टेट डिवेलपर्स की मार्केटिंग की चाल का हिस्सा हैं? लियासेज फोरास रियल एस्टेट रेटिंग एंड रिसर्च के नेशनल हेड (कंसल्टिंग) आकाश बंसल ने कहा, ‘मोटे कर्ज की लागत बिल्डरों पर लदी हुई है। उनका मार्जिन घट रहा है और इनवेंटरी बढ़ रही है।

     लिहाजा वे कस्टमर्स को लुभाने के लिए कई तरह के ऑफर दे रहे हैं।’ ऐसे ऑफर्स को लपकने से पहले उन्हें ठीक से समझ लेना बेहतर होगा। इन ऑफर्स को मोटे तौर पर चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है: कैश या कैश जैसी छूट, नॉन-कैश डिस्काउंट्स, सबवेंशन स्कीम्स और जीएसटी में रियायत। आइए देखते हैं कि इन ऑफर्स से आपकी लागत घटती है या नहीं।

कैश डिस्काउंट्स

     इसमें साफ-साफ बताया जाता है कि कितने की नकद छूट मिलेगी। हो सकता है कि 150-300 रुपये प्रति स्क्वेयर फुट का कैश डिस्काउंट दिया जाए या 5-6 लाख रुपये का एकमुश्त डिस्काउंट (करीब 60 लाख रुपये की प्रॉपर्टी पर) दिया जाए। इसके तहत रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी चार्जेज से छूट और फ्री कार पार्किंग आदि के ऑफर हो सकते हैं। रियल एस्टेट एडवाइजरी पोर्टल प्रॉपटाइगर के चीफ इनवेस्टमेंट ऑफिसर अंकुर धवन ने कहा, ‘ऐसे ऑफर आसानी से समझ में आते हैं। इनसे बायर की लागत सीधे तौर पर घट जाती है।’ ये ऑफर आमतौर पर सीमित समय के लिए होते हैं और इनके तहत यूनिट्स की संख्या भी सीमित होती है। हालांकि इस तरह के सीमित समय वाले ऑफर्स देखकर निर्णय करने में जल्दबाजी हो सकती है और यह बात निवेशक के हितों के खिलाफ जा सकती है। जो ‘डिस्काउंट’ दिया जा रहा हो, उसके पहले के दाम पर एक नजर डाल लेनी चाहिए।

      5000 रुपये प्रति स्क्वेयर फुट के बेस प्राइस पर 200 रुपये प्रति वर्ग फुट की छूट आकर्षक दिख सकती है, लेकिन 600 स्क्वेयर फुट के फ्लैट पर इसमें महज 1.2 लाख रुपये की बचत होगी। ऐसे में हर ऑफर की पड़ताल करना जरूरी हो जाता है।

कंप्लीमेंट्री फर्नीचर, गैजेट्स

      इस तरह के ऑफर्स में फ्री मॉड्यूलर किचेन, मुफ्त टू या फोर व्हीलर, हॉलिडे पैकेज, गोल्ड कॉइन, व्हाइट गुड्स आदि शामिल होते हैं। सवाल यह है कि क्या ये वाकई फ्री होते हैं? एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे किसी भी ऑफर की ओवरऑल कॉस्ट प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से घर की कीमत में जोड़ दी गई होती है। अग्रवाल एस्टेट्स के फाउंडर मनोज अग्रवाल ने कहा, ‘बिल्डर आमतौर पर ऐसी डील्स देने के लिए बेस प्राइस बढ़ा देते हैं।’ कुछ डिवेलपर्स हो सकता है कि ठीक डील्स ऑफर कर रहे हों, लेकिन वह सब प्रॉपर्टी की कॉस्ट का महज 1-8 पर्सेंट होता है। फिर जो प्रॉडक्ट्स ऑफर किए जा रहे हों, उनकी क्वॉलिटी के मामले में आपका कोई दखल नहीं होता है।

     लिहाजा डिवेलपर्स से इसके बजाय कैश डिस्काउंट मांगना बेहतर रहता है क्योंकि आप उस पैसे का इस्तेमाल अपनी मर्जी से कर सकते हैं। हालांकि बायर्स जब फ्री गुड्स के बदले में कैश डिस्काउंट मांगते हैं तो प्राय: उन्हें मुफ्त दी जा रही चीजों की वैल्यू के लगभग 50 पर्सेंट के बराबर रकम ही दी जाती है। अग्रवाल ने कहा, ‘दरअसल बिल्डर के लिए उन चीजों की लागत काफी कम होती है क्योंकि वह उन्हें बड़ी संख्या में खरीद रहा होता है।’ गुड्स की वैल्यू के मुकाबले कैश डिस्काउंट कम होने के बावजूद नकदी लेना बेहतर हो सकता है, जिससे आपके रियल्टी इनवेस्टमेंट से अच्छा रिटर्न पाने में मदद मिल सकती है। हो सकता है कि प्रॉपर्टी की वैल्यू चढ़े या न चढ़े, लेकिन फ्री में दी जाने वाली चीजों की वैल्यू समय बीतने के साथ निश्चित रूप से घटेगी। एनारॉक प्रॉपर्टी के चेयरमैन अनुज पुरी ने कहा, ‘इसमें कोई शक नहीं है कि फ्री में मिलने वाली चीजों का आकर्षण होता है, लेकिन देखना यह चाहिए कि इससे प्रॉपर्टी की वैल्यू में कोई बढ़ोतरी हो रही है या नहीं और खरीदार की बचत में बढ़ोतरी हो रही है या नहीं।’

आसान पेमेंट प्लान

      अभी 7-8 फीसदी का भुगतान करें और बाकी प्रॉपर्टी का पजेशन मिलने पर या पजेशन नहीं मिलने तक कोई ईएमआई नहीं। कई डिवेलपर्स इस तरह के फ्लेक्सिबल पेमेंट प्लान ऑफर कर रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन स्कीमों का मकसद खरीदारों की कैश की चिंता को ध्यान में रखते हुए पेमेंट के लिए उन्हें वक्त मुहैया कराना है। हालांकि, ये प्लान सस्ते नहीं होते। सबवेंशन स्कीम का विकल्प चुनने वालों के लिए प्रॉपर्टी की कीमत फुल पेमेंट करने वालों के मुकाबले ज्यादा पड़ती है।

      कुशमैन एंड वेकफील्ड में सीनियर डायरेक्टर, रिसर्च (इंडिया) सिद्धार्थ गोयल ने बताया, ‘कीमतों का अंतर 500 से 1,000 रुपये वर्ग फुट हो सकता है। लिहाजा आपको सबवेंशन स्कीम और तत्काल पेमेंट पर प्रॉपर्टी की कीमतों पर मिलने वाली छूट की तुलना जरूर करनी चाहिए।’

       आपको यह भी चेक करना चाहिए कि क्या सबवेंशन स्कीम की कोई समयसीमा है। मसलन बाकी रकम किसी खास पीरियड के आखिर तक भुगतान की जानी है या पजेशन मिलने पर। गोयल कहते हैं, ‘पजेशन मिलने पर भुगतान से जुड़ी स्कीम को चुनना बेहतर विकल्प है, क्योंकि इससे खरीदारों को पेमेंट और पैसों के इंतजाम के लिए ज्यादा से ज्यादा वक्त मिल सकेगा।’

      कुछ डिवेलपर्स इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम भी ऑफर करते हैं, जहां वे कंस्ट्रक्शन के दौरान ब्याज के भुगतान की जिम्मेदारी लेते हैं। यह स्कीम भी प्रॉपर्टी की ऊंची बेसिक प्राइस की कीमत पर आती है। बाकी बायर्स के इंटरेस्ट का सर्विस वाला हिस्सा ऑफर करते हैं- अगर बैंक 9 पर्सेंट ब्याज ले रहा है, तो सबवेंशन पीरियड के दौरान बिल्डर 4 पर्सेंट इंटरेस्ट के भुगतान का ऑफर देता है। एचडीएफसी रियल्टी के सीईओ विक्रम गोयल ने बताया, ‘इस तरह की स्कीम वास्तव में डिवेलपर्स को ज्यादा मदद करती है, क्योंकि इससे उन्हें कम कॉस्ट (4-7 पर्सेंट) पर फंड जुटाने में मदद मिलती है और वित्तीय संस्थानों से उधारी के मुकाबले बचत होती है, जिनकी दर 11-12 पर्सेंट होती है। लिहाजा आपको सावधानी से इसका पता लगाना चाहिए कि क्या सबवेंशन स्कीम वाकई में आपके लिए फायदेमंद है।

GST की छूट

      कई डिवेलपर्स अपने प्रोजेक्ट्स पर जीएसटी से छूट या कोई जीएसटी नहीं जैसे ऑफर पेश कर रहे हैं। पहली नजर में यह सीधा 12 पर्सेंट डिस्काउंट (अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स पर 12 पर्सेंट जीएसटी लगाई गई है) का मामला लगता है, लेकिन ऐसे विज्ञापन गुमराह करने वाले हो सकते हैं। गोयल ने कहा, ‘जीएसटी सिर्फ वैसे अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स पर लागू है, जिन्हें ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) नहीं मिला है।’ लिहाजा, रेडी टु मूव इन प्रॉपर्टी को ‘जीएसटी माफ’ के झूठे दावे के साथ नहीं बेचा जा सकता है।

     अगर कोई बिल्डर किसी अंडरकंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी पर जीएसटी बेनेफिट ऑफर कर रहा है, बायर्स को निश्चित तौर पर इस बात का पता लगाना चाहिए कि क्या प्रॉपर्टी को ओसी मिला है। साथ ही, ओसी से पहले और इसके बाद की प्रॉपर्टी की कीमतों की तुलना की जानी चाहिए। ओसी से पहले की कीमतों में जीएसटी का मामला शामिल होता है और ओसी के बाद की कीमत भी उतनी ही या थोड़ी कम है, तो इसका मतलब यह है कि जीएसटी का पूरा फायदा बायर को नहीं दिया गया है। अग्रवाल कहते हैं, ‘बिल्डर्स आमतौर पर ओसी मिलने के बाद कीमतें नहीं घटाते हैं। लिहाजा वास्तविक डिस्काउंट जानने के लिए आपको जरूरी प्राइस ब्रेक-अप के बारे में पूछना चाहिए।’ धवन के मुताबिक, ‘आपको जीएसटी माफी से जुड़े डिस्काउंट की भी तुलना करना चाहिए। अगर मौजूदा कस्टमर को ऑफर किए जा रहे डिस्काउंट से माफी ज्यादा है, तभी इसे स्पेशल स्कीम माना जा सकता है।’

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