खास खबर: क्या 30 लाख को मिल पाएगा अपना घर, नए कानून से जगी है आस

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    सत्‍ता संभालते ही मोदी सरकार के समक्ष देश में रियल एस्‍टेट कारोबार की मंदी को दूर करना और 30 लाख से अधिक होम बायर्स को घर दिलाना बड़ी चुनौती था। सरकार ने चार साल के   दौरान इस चुनौती से निपटने के लिए कई बड़े व अहम कदम उठाए हैं। हालांकि अब तक इसका सीधा फायदा न तो रियल एस्‍टेट मार्केट को मिला है और ना ही होम बायर्स को, लेकिन हालात सुधरने के संकेत जरूर मिलने लगे हैं। ऐसा ही एक बड़ा कदम,  23 मई 2018 को हुई कैबिनेट की बैठक में उठाया गया। कैबिनेट ने इन्‍सॉल्‍वेंसी एंड बैंकरप्‍सी कोड (IBC) में बदलाव को मंजूरी दे दी। जिसमें, किसी रियल एस्‍टेट कंपनी के डूबने पर संपत्ति की नीलामी में होम बायर्स का भी हिस्‍सा होगा। इसे होम बायर्स के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है। आइए, जानते हैं इसके मायने -

क्‍यों पड़ी जरूरत

     सबसे पहले जानते हैं कि आखिर IBC में बदलाव की जरूरत क्‍यों पड़ी। दरअसल, अगस्‍त 2017 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्‍यूनल ने आईडीबीआई बैंक की इन्‍सोल्‍वेंसी एंड बैंकरप्‍सी कोड के तहत जेपी इंफ्राटेक के खिलाफ दायर याचिका को स्‍वीकार कर लिया और इन्‍सोल्‍वेंसी प्रोसेस शुरू करने को कहा। तब जेपी इंफ्राटेक के होम बायर्स को पता चला कि IBC में उनके लिए कोई अलग से व्‍यवस्‍था नहीं है, बल्कि उन्‍हें अनसिक्‍योर्ड क्रेडिटर माना जाएगा। यानी कि यदि जेपी इंफ्राटेक की प्रॉपर्टी की नीलामी होती है तो होम बायर्स का नंबर लगभग आखिर में आएगा। यह जानने के बाद लगभग 24 होम बायर्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपील की कि इस मामले में उन्‍हें फाइनेंशियल क्रेडिटर की कैटेगगरी में रखा जाए, ताकि उनका पैसा वापस मिल सके। इसे सही मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इन्‍सॉल्‍वेंसी प्रॉसेस रोक दिया था और सरकार से कहा कि बायर्स को सिक्‍योर्ड क्रेडिटर की कैटेगरी में लाया जाए।

30 लाख बायर्स को मिल सकती है राहत

     हालांकि अभी जेपी इंफ्राटेक के अलावा आम्रपाली डेवलपर्स का मामला ही एनसीएलटी में विचाराधीन है। लेकिन जल्‍द ही हालात नहीं सुधरे तो ज्‍यादातर डेवलपर्स के मामले एनसीएलटी में पहुंच जाएगा, ऐसे में यह जरूरी हो गया था कि अंडर कंस्‍ट्रक्‍शन प्रोजेक्‍ट्स के मामलों में होम बायर्स को भी क्रेडिटर माना जाए। जहां तक देश में अंडर कंस्‍ट्रक्‍शन प्रोजेक्‍ट्स की संख्‍या का सवाल है तो नवंबर 2017 में जारी रियल एस्‍टेट मार्केट पर रिसर्च करने वाली एजेंसी लियासेस फोरास की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 43 शहरों में लगभग 29.23 लाख अंडर कंस्‍ट्रक्‍शन घर अपने तय समय से डिले हैं। इसमे से 6 लाख घर दिल्‍ली एनसीआर में हैं, जिनका कंस्‍ट्रक्‍शन पूरा नहीं हो पाया। इसके अलावा केंद्र सरकार की ओर से बॉम्‍बे हाईकोर्ट को बताया गया था कि अकेले महाराष्‍ट्र में अंडर कंस्‍ट्रक्‍शन प्रोजेक्‍ट्स में 5.3 लाख अपार्टमेंट डिले हैं। हालांकि लियासेस फोरास की रिपोर्ट लगभग 6 माह पुरानी है, लेकिन बायर्स का आरोप है कि बिल्‍डर्स का रवैया नहीं बदला है और बिल्‍डर्स कंस्‍ट्रक्‍शन की ओर फोकस नहीं कर रहे हैं।

कमेटी ने की सिफारिश

      इस मामले में फाइनेंस मिनिस्‍ट्री की ओर से एक कमेटी बनाई गई। कमेटी ने न केवल आईबीसी के नियमों की पूरी पड़ताल की और बायर्स के इंटरेस्‍ट को देखते हुए उन्‍हें फाइनेंशियल क्रेडिटर की कैटेगिरी में शामिल करने की सिफारिश की। कमेटी ने अपनी सिफारिश में कहा है कि बिल्‍डर के दिवालिया होने पर उन बायर्स को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता, जिन्‍हें पजेशन नहीं मिला है। इससे तो उनके सारे पैसे डूब जाएंगे और उन्‍हें घर भी नहीं मिलेगा।

कैसे मिलेगा हिस्‍सा

     कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि दिवालिया होने पर बिल्‍डर या रियल एस्‍टेट कंपनी की प्रॉपर्टी पर जितना पैसा मिलेगा, उसमें कितना फीसदी होम बायर्स को दिया जाए, इस बात का फैसला कई पैमानों पर तय किया जा सकता है। सबसे पहले यह देखा जाएगा कि बिल्‍डर पर कितना पैसा बकाया है। कितने होम बायर्स को पजेशन नहीं मिला है और उनकी कितनी देनदारी है। यह देखा जाएगा कि कितने का लोन बिल्‍डर पर बकाया है। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि प्रॉपर्टी बेचने के बाद उससे प्राप्‍त पैसे में कितना हिस्‍सा होम बायर्स को दिया जा सकता है। इसके लिए बैंकों और अन्‍य एक्‍सपर्ट से बात करके अंतिम फैसला लिया जाएगा।

यह होगा प्रोसेस

       कमेटी ने IBC के तहत ऐसे मामलों को सुलझाने के लिए तीन मापदंड तय किए हैं। पहले इन्‍सॉल्‍वेंसी रिजॉल्‍यूशन प्रोफेशनल द्वारा कंपनी से बात की जाएगी और उसे इस समस्‍या को निपटाने के लिए तय समय दिया जा सकता है। अगर कंपनी बात न करे तो तय समय के बाद उसकी प्रॉपर्टी अटैच की जाएगी। अगर कंपनी खुद को दिवालिया घोषित करती है तो उसकी पूरी प्रॉपर्टी अटैच कर उसे तुरंत बेचा जा सकता है।

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source: मनी भास्कर, नई दिल्ली.

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